Wednesday, April 14, 2021

कारक ~ सामान्य परिचय एवं कर्ता कारक


 कारक


            क्रियाजनकत्वं कारकत्वम् । क्रियान्वयित्वं कारकत्वम् । अर्थात् जो क्रिया का जनक होता है या जो क्रिया को क्रियान्वित करता है अथवा जिसका क्रिया से सीधा या परस्पर सम्बन्ध‌ होता है, वह कारक कहलाता है। कारक के क्रिया से सीधे या परस्पर सम्बन्ध‌ को एक उदाहरण से जाना व समझा जा सकता है। 

हे मनुष्या:! यज्ञदत्तस्य पुत्र: देवदत्त: स्वहस्तेन कोषात् निर्धनाय ग्रामे धनं ददाति।

आइये क्रिया से प्रश्नोत्तर के माध्यम से जानते हैं कि क्रिया का कारकों के साथ सीधा सम्बन्ध किस प्रकार से है?

         उक्त उदाहरण में ददाति क्रिया का देवदत्त: स्वहस्तेन कोषात् निर्धनाय‌ ग्रामे धनम् आदि पदों से सीधा या परस्पर प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। अत: ये सभी कारक कहे जाते है। हे मनुष्या: और यज्ञदत्तस्य का सम्बन्ध क्रिया से नही है अत: ये दोनो पद कारक नही है। यहाँ सम्बन्ध कारक तो नही है परन्तु उसमें षष्ठी विभक्ति होती है और सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति होती है।

कारको के भेद :-

संस्कृत में कारकों की संख्या छह  मानी गई है। यथा 

कर्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च। 

अपादानाधिकरणमित्याहुः कारकाणि षट् ।।

1  कर्ता         2  कर्म         3  करण

4  सम्प्रदान    5  अपादान    6  अधिकरण


संस्कृत में शब्दरूपों में सात विभक्तियों होती हैं और ये सात विभक्तियाँ ही कारक के रूप में जानी जाती हैं।


प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक)

1    स्वतंत्र: कर्ता ~ क्रिया को करने में जो स्वतंत्र हो वह कर्ता कहलाता है। यथा मोहन: पठति। यहाँ पठन क्रिया को करने के लिए स्वतंत्र है अतः मोहन: कर्ता है।

कर्ता की स्थिति के अनुसार वाक्य / वाच्य तीन प्रकार के होते हैं।

कर्तृवाच्य - मोहन: पुस्तकं‌ पठति।

कर्मवाच्य - मोहनेन पुस्तकं पठ्यते।

भाववाच्य - मोहनेन हस्यते।


2    प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा ~ प्रातिपदिकार्थ मात्र में, लिंग मात्र की अधिकता में, परिमाण मात्र की अधिकता में, वचन मात्र की अधिकता में, प्रथमा विमक्ति होती है।

उदाहरण

प्रातिपदिकार्थमात्रे 

A अलिंग - उच्चै: नीचै: शनै: अभित: अत्र तदा

B  नियतलिंग - कृष्ण: श्री ज्ञानम्

लिंगमात्राधिक्ये

C .अनियतलिंग - तट: तटी तटम्

परिमाणमात्राधिक्ये - द्रोणो व्रीहि:

वचनमात्राधिक्ये - एक: द्वौ बहव:


3    सम्बोधने च ~ सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति होती है।

उदाहरण

हे राम! अत्र आगच्छ।

हे सीते! पुस्तकं ददातु।

Tuesday, April 13, 2021

अव्ययपदानि


 अव्ययपदनि


संस्कृत भाषा में शब्द दो प्रकार के होते हैं।

१. विकारी और २. अविकारी। 

1     विकारी शब्द - वे शब्द जिनका तीनो लिंगो, तीनों वचनों तथा सभी विभक्तियों में रूप परिवर्तित हो जाता है अभी विकारी शब्द कहलाते हैं। यथा - राम (राम: रामेण रामेभ्य:), नगर (नगरम् नगरे नगराणि), तट (तट: तटी तटम्) आदि।

2     अविकारी शब्द -  जो शब्द तीनों लिंगो तीनों वचनों तथा सभी विभक्तियों में एक समान (एक-जैसे) रहते है। हमें कोई रूप परिवर्तन नहीं होता वे अविकारी शब्द कहलाते हैं जिन्हें अव्यय भी कहा जाता है। यथा - उच्चै: शनै: अत्र तत्र यदा कदा अपि आदि।

सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु,सर्वासु च विभक्तिषु । 

वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्ययेति तदव्ययम् ।।


अव्यय दो प्रकार के होते हैं :-

1     रूढ़ / अव्युत्पन्न - जो न किसी शब्द के योग से निर्मित होते हैं और न ही किसी धातु के योग से इनकी उत्पत्ति होती है। जैसे - च, अपि, वा, विना, पृथक्

2     यौगिक / व्युत्पन्न - जिनका निर्माण किसी धातु अथवा शब्द के योग से होता है। ये दो प्रकार के होते है:-

  A     कृदन्त अव्यय - पठित्वा पठितुम्

  B     तद्धितान्त अव्यय - सर्वदा चतुर्धा। तद्धित अव्ययों के भी भेद है:-

     a     विभक्ति बोधक - कुत: ग्रामत: कुत्र अत्र

     b     काल बोधक - यदा कदा सर्वदा

     c     प्रकार बोधक - यथा तथा कथम् इत्थम्

     d     विविधता बोधक - अनेकश: पंचकृत्व


पाठ्यक्रम में निर्धारित अव्ययपदानि


Friday, April 2, 2021

समास ~ सामान्य परिचय एवं अव्ययीभाव समास

 

समास

समास इत्युक्ते संक्षिप्तीकरणम्। समसनं‌ समास:। अनेकपदानाम् एकपदीभवनं समास:। अर्थात् अनेक (दो या दो से अधिक) पद मिलकर जब एक पद हो जाते हैं तो अनेक पदो के एकपद होने की प्रक्रिया को समास कहा जाता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत दोनों पदों के मध्य आने वाली विभक्तियों अथवा कारक चिह्नों का लोप होकर एक नया पद बन जाता है। संस्कृत में विभक्ति कार्य होने पर वह पद बनता है। 

    समास को सीखने से पहले समास से जुड़ी शब्दावली के विषय में जान लेते है

1    समस्तपद - समास विधि से बने पद 

2    पूर्वपद - समस्त पद का पहला पद

3    उत्तरपद - समस्त पद का दूसरा पद

4     समास विग्रह - समस्त पद का विस्तृत रूप


उदाहरण 1 - सीतापति:

सीतापति: = समस्त पद (समास विधि से बना पद)

सीता = पूर्वपद (समस्त पद का पहला पद)

पति: = उत्तरपद (समस्त पद का दूसरा पद)

सीताया: पति: = समास विग्रह (समस्त पद का विस्तृत रूप)

उदाहरण 2 - राजकुमार

राजकुमार = समस्त पद (समास विधि से बना पद)

राज = पूर्वपद (समस्त पद का पहला पद)

कुमार = उत्तरपद (समस्त पद का दूसरा पद)

राजा का कुमार = समास विग्रह (समस्त पद का विस्तृत रूप)


समास के भेद 

समास के मुख्य रूप से चार भेद होते हैं। पद के अर्थ (पदार्थ) की प्रधानता के आधार पर ही समास के ये भेद होते हैं। प्रायेण पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावः भवति ।

प्रायेण उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः भवति । तत्पुरुषस्य भेदः कर्मधारयः भवति । कर्मधारयस्य भेदः द्विगुः भवति । 

प्रायेण अन्यपदार्थप्रधानः बहुव्रीहिः भवति।

प्रायेण उभयपदार्थप्रधानः द्वन्द्धः भवति। 

इस प्रकार समास के सामान्यत: छ: भेद होते हैं:-

1    अव्ययीभाव समास

2    तत्पुरुष समास ~ कर्मधारय समास ~ द्विगु समास

3    द्वन्द्व समास

4    बहुव्रीहि समास

विशेष - यहाँ तत्पुरुष का भेद कर्मधारय तथा कर्मधारय का भेद द्विगु है।

परन्तु संस्कृत में समास के पाँच भेद हो जाते हैं। स च विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवलसमासः

5    केवल समास



1     अव्ययीभाव समास (अव्ययंविभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्धि-अर्थाऽभावाऽत्ययासंप्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्-यथाऽऽनुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्याऽन्त-वचनेषु)

       जिसमें  प्राय: पूर्वपद के अर्थ की प्रधानता होती है वह अव्ययीभाव समास कहलाता है। (1) विभक्ति (2) समीप (3) समृद्धि (4) व्यृद्धि - समृद्धि का नाश (5) अभाव (6) नष्ट होना (7) अनुचित (8) शब्द की अभिव्यक्ति (9) पश्चात् (10) यथा (11) क्रमश: (12) एक साथ होना (13) समानता (14) संपत्ति (15) सम्पूर्णता (16) अन्त। इन अर्थों में वर्तमान अव्यय का सुबन्त के साथ जब नित्य समास होता है, तब यह अव्ययीभाव समास होता है। अर्थात्

(क)   जो शब्द समास होने से पूर्व तो अव्यय न हो किन्तु समास होने पर "अव्यय" हो जाये, वही अव्ययीभाव समास है।

(ख)   इस समास का प्रथम शब्द अव्यय तथा द्वितीय शब्द संज्ञा शब्द होता है। 

(ग)    अव्यय शब्दार्थ की अर्थात् पूर्व पद की प्रधानता होती है। 

(घ)    समास के दोनों पद मिलकर अव्यय होते हैं। 

(ङ)    अव्ययीभाव समास नपुंसकलिङ्ग के एकवचन में होता है।


उदाहरण :-

Sunday, March 28, 2021

छन्द भाग ~ 2

छन्द (भाग ~ 2)

द्रुतविलम्बितम् छन्द:

लक्षणम् - द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ ।।

प्रतिचरणे वर्णा: - 12 वर्णा:

गणानां क्रम: -  नगण (।।।), भगण (ऽ।।), भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ) 

उदाहरणम्

नवपलाशपलाशवनं पुरः,
स्फुटपरागपरागत पङ्कजम् ।
मृदुलतान्तलतान्तमलोकयत्,
स सुरभिं सुरभिं सुमनोभरैः ।।

प्रथम पंक्ति में गणचिह्न देखें ~

नवपलाशपलाशवनं पुरः

। ।। ऽ । । ‌ ऽ । । ऽ  ।ऽ


शिखरिणी छन्द:

लक्षणम् -  रसै: रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलाग: शिखरिणी ।।

प्रतिचरणे वर्णा: - 17 वर्णा:

गणानां क्रम: -  यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), सगण (।।ऽ), भगण (ऽ।।), 1 लघु (।), 1 गुरु (ऽ)

यति: - 

उदाहरणम्

अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै ।
रनाविद्धं रत्नं मधुनवमनास्वादितरसम् ।
अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्वूपमनघंम् ।
न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः ।।

प्रथम पंक्ति में गणचिह्न देखें ~

अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै

। ऽ ऽ  ऽ ऽ  ऽ  ।  । । । । ऽऽ । ।। ऽ


मन्दाक्रान्ता छन्द:

लक्षणम् -  मन्दाक्रान्ताम्बुधि रसनगैर्मो भनौ तौ गयुग्मम् ।।

प्रतिचरणे वर्णा: - 17 वर्णा:

गणानां क्रम: -  मगण (ऽऽऽ), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), 2 तगण (ऽऽ।), 2 गुरु (ऽऽ)

यति: -  अम्बुधि (महासागर) = 4, रस = 6, नग (महाद्वीप) = 7

उदाहरणम् -

कश्चित् कान्ताविरहगुरुणास्वाधिकारात्प्रमत्तः,
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः 
यक्षश्चक्रेजनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु । ॥

प्रथम पंक्ति में गणचिह्न देखें

कश्चित् कान्ताविरहगुरुणास्वाधिकारात्प्रमत्तः

ऽ  ऽ     ऽ   ऽ ।। । ।।  ऽ   ऽ । ऽ  ऽ  । ऽ ऽ


स्रग्धरा छन्द:

लक्षणम् -  म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनि यतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम् ।।

प्रतिचरणे वर्णा: - 21 वर्णा:

गणानां क्रम: -  मगण (ऽऽऽ), रगण (ऽ।ऽ), भगण (ऽ।।), नगण (।।।) 3 यगण (।ऽऽ)

यति: - प्रत्येक सातवें वर्ण पर ।  (त्रिमुनि यति)

उदाहरणम्

या सृष्टिः स्रष्टुराधा, वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री,
 ये द्वे कालं विधत्तः, श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम् ।
 यामाहुः सर्वबीज प्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः,
 प्रत्यक्षाभिः प्रपत्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिर्ष्टाभिरीशः ।।

प्रथम पंक्ति में गणचिह्न देखें

या सृष्टिः स्रष्टुराद्या, वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री

ऽ   ऽ ऽ   ऽ ‌।ऽ  ऽ   ।‌। ।   । ।  ।ऽ  ऽ  । ऽ ऽ  ।   ऽ ऽ



Thursday, October 22, 2020

विसर्ग सन्धि


विसर्ग सन्धि


  1. सत्व विसर्ग सन्धि (विसर्जनीयस्य स:) = यदि विसर्ग के बाद खर्‌ (वर्ग का पहला दूसरा वर्ण व श् ष् स्) आए तो  विसर्ग  को स् हो जाता है।

विसर्ग  ~  स्  +  ख् फ् छ् ठ् थ् च् ट् त् क् प् श् ष् स् 

उदाहरण

विष्णु: + त्राता - विष्णुस्त्राता

राम: + च - रामस् + च | रामश्च

धनु: + टंकार: - धनुस् + टंकार: | धनुष्टंकार:

नि: + छल: - निस् + छल: | निश्छल:

नम: + ते - नमस्ते

हरि: + शेते - हरिस् +शेते | हरिश्शेते

नि: + सन्देह: - निस्सन्देह:

नृप: + षष्ठ: - नृपस् + षष्ठ: | नृपष्षष्ठ:

नि: + फलम् - निस् + फलम् | निष्फलम्

दु: + कर्म - दुस् + कर्म | दुष्कर्म


  1. रुत्व विसर्ग सन्धि (ससजुषो रु) = पदान्त स् एवं सजुष् के स् को रु आदेश हो जाता है। 'खरवसानयो: विसर्जनीय:' सूत्र से अवसान में  अथवा खर् बाद में होने पर  रु को विसर्ग  हो जाता है।

उदाहरण

शिवस् - शिवरु - शिव:

रामस् - रामरु - राम:

हरिस् - हरिरु - हरि:



  1. उत्व विसर्ग सन्धि (अतो रोरप्लुतादप्लुते; हशि च) = अप्लुत अ से परे रु के बाद अ तथा हश् (वर्ग का तीसरा चौथा पाँचवा वर्ण, अन्त:स्थ तथा ह) आए 8तो रु को उ हो जाता है।

उदाहरण

शिवस् + अर्च्य: | शिवरु + अर्च्य: | शिवउ + अर्च्य: | शिवोऽर्च्य:

कस् + अपि | करु + अपि | कउ + अपि | कोऽपि

रामस + अयम् | रामरु + अयम् | रामउ + अयम् | रामोऽयम्

रामस + अवदत् | रामरु + अवदत् | रामउ + अवदत् | रामोऽवदत्

शिवस् + वन्द्य: | शिवरु + वन्द्य: | शिवउ + वन्द्य: | शिवो वन्द्य:

रामस + हसति | रामरु + हसति | रामउ + हसति | रामो हसति

बालस् + याति | बालरु + याति | बालउ + याति | बालो याति

नमस्  + नम: | नमरु + नम: | नमउ + नम: | नमोनम:

मनस् + हर: | मनरु + हर: | मनउ + हर: | मनोहर:

यशस् + दा | यशरु + दा | यशउ + दा | यशोदा


  1. रेफ विसर्ग सन्धि (इचोऽशि विसर्गस्य रेफ:) = इच् (अ को शेष सभी स्वर) से परे विसर्ग के बाद यदि अश्‌ (सभी स्वर, वर्ग का तीसरा चौथा पाँचवा वर्ण, अन्त:स्थ तथा ह) आए तो विसर्ग को रेफ (र्) हो जाता है।

उदाहरण

मुनि: + इति - मुनिरिति

धेनु: + गच्छति - धेनुर्गच्छति

भानु: + असौ - भानुरसौ

एतै: + भक्षितम् - एतैर्भक्षितम्

नि: + जन: - निर्जन:

ज्योति: + गमय - ज्योतिर्गमय:

तयो: + मध्ये - तयोर्मध्ये

गौ: + इति - गौरिति

वधू: + एषा - वधूरेषा


विशेष - अव्यय, ऋकारान्त, सम्बोधन पदों की स्थिति में अ से परे भी विसर्ग को रेफ (र्) हो जाता है।

उदाहरण

पुन: + अत्र - पुनरत्र

प्रात: + गच्छति - प्रातर्गच्छति

पित: + वन्दे - पितर्वन्दे

मात: + वन्दे - मातर्वन्दे


  1. विसर्ग लोप विसर्ग सन्धि (आतोऽशि विसर्गस्य लोप:) = पूर्वसूत्र संख्या 4 का अनुसरण करते हुए आ से परे विसर्ग के बाद यदि अश्‌ (सभी स्वर व वर्ग का तीसरा चौथा पाँचवा वर्ण, अन्त:स्थ तथा ह) आए तो विसर्ग का लोप हो जाता है।

उदाहरण

बाला: + अत्र - बाला अत्र

लता: + एधन्ते - लता एधन्ते

ता: + गच्छन्ति - ता गच्छन्ति

बाला: + हसन्ति - बाला हसन्ति

‌‌

विशेष - अ से परे विसर्ग के बाद अ के अलावा कोई भी स्वर आए तो विसर्ग का लोप हो जाता है।

उदाहरण

राम: + आगच्छति - राम आगच्छति

कृष्ण: + एति - कृष्ण एति

बाल: + इच्छति - बाल इच्छति


  1. रेफ लोप विसर्ग सन्धि (रो रि) = स्वर से परे रेफ (र्) के बाद यदि रेफ (र्) आए तो रेफ (र्) का लोप हो जाता है साथ ही रेफ (र्) लोप से पूर्वस्वर दीर्घ हो जाता है।

उदाहरण

पुन: + रमते | पुनर् + रमते | पुन + रमते - पुना रमते

कवि: + रचयति | कविर् + रचयति | कवि + रचयति | कवी + रचयति

भानु: + राजते | भानुर् + राजते | भानु + राजते | भानू + राजते

हरि: + रम्य: | हरिर् + रम्य: | हरि + रम्य: | हरी + रम्य:

व्यञ्जन सन्धि


व्यंजन सन्धि


  1. घोष व्यंजन / जश्त्व व्यंजन सन्धि (झलां जशोऽन्ते) = यदि पद के अन्त में झल्‌ (वर्ग का पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा अक्षर तथा श् ष् स् ह्) आए तो उसके स्थान पर जश् (वर्ग का तीसरा अक्षर) हो जाता है।

क् ख् ग् घ्  ~  ग्     

च् छ् ज् झ्  ~  ज्

ट् ठ् ड् ढ्  ~  ड्   

त् थ् द् ध्  ~  द्

प् फ् ब् भ्  ~  ब्

उदाहरण

वाक् + ईश: - वागीश:

जगत् + ईशः - जगदीशः

षट् + आनन: - षडाननः

दिक् + अम्बर: - दिगम्बर:

अच् + अन्त: - अजन्त:

सुप् + अन्त: - सुबन्त:

दिक् + गज: - दिग्गज:

षट् + दर्शनम् - षड्दर्शनम्


  1. अघोष व्यंजन / चर्त्व व्यंजन‌ सन्धि (खरि च) = यदि पद के अन्त में झल्‌ (वर्ग का पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा अक्षर तथा श् ष् स् ह्) आए और उसके बाद खर् (वर्ग का पहला, दूसरा अक्षर) आए तो झल् के स्थान पर चर् (वर्ग का पहला अक्षर) हो जाता है।

क् ख् ग् घ्  ~  क्  +  क् ख्  

च् छ् ज् झ्  ~  च्  +  च् छ्

ट् ठ् ड् ढ्  ~   ट्  +  ट् ठ्  

त् थ् द् ध्  ~  त्  +  त् थ् / स्

प् फ् ब् भ्  ~  प्  + प् फ्

उदहरण

सद् + कार: - सत्कार:

विपद् + काल: - विपत्काल:

सम्पद् + समय: - सम्पत्समय:

ककुभ् + प्रान्त: - ककुप्प्रान्त:

उद् + पन्न: - उत्पन्न:


  1. पूर्वसवर्ण व्यंजन सन्धि (झयो होऽन्यतरस्याम्) = झय् (वर्ग का पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा अक्षर) के बाद यदि ह् वर्ण आए तो ह् के स्थान पर उसी वर्ग का चतुर्थ वर्ण आदेश होगा।

उदाहरण

वाक् + हरि: | वाग् + हरि: - वाग्घरि:

अच् + हलौ | अज् + हलौ - अज्झलौ

सम्पद् + हर्ष: - सम्पद्धर्ष:

रत्नमुड् + हरति - रत्नमुड्ढरति

ककुब् + हसति - ककुब्भसति


  1. तालव्य व्यंजन / श्चुत्व व्यंजन संन्धि (स्तो: श्चुना श्चु:) = स् / तवर्ग के बाद या पहले श् / चवर्ग आए तो स् को श् तथा तवर्ग को चवर्ग हो जाता है।

स् / त् / थ् / द् / ध् / न्  +  श् / च् / छ् / ज् / झ् / ञ् = ?

अथवा

श् / च् / छ् / ज् / झ् / ञ्  +  स् / त् / थ् / द् / ध् / न् = ?

? = स् ~ श् ।। त् ~ च् ।। थ् ~ छ् ।। द् ~ ज् ।। ध् ~ झ् ।। न् ~ ञ्

उदाहरण

कस् + चित् - कश्चित्

रामस् + चिनोति - रामश्चिनोति

रामस् + च - रामश्च

हरिस् + शेते - हरिश्शेते

सत् + चित् - सच्चित्

सत् + छात्र: - सच्छात्र:

उद् + ज्वल: - उज्ज्वल:

सद् + जन: - सज्जन:

बुध् + झटिति - बुझ्झटिति

कथ् + झटिति - कछ् झटिति

शार्ङ्गिन् + जय: - शार्ङ्गिञ्जयः

शत्रून् + जयति - शत्रूञ्जयति


  1. छत्व व्यंजन सन्धि (शश्छोऽटि) = झय् (वर्ग का पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा अक्षर) के बाद यदि श् आए और श् के बाद अट् (स्वर और ह य व र) आए  तो श् को छ् हो जाता है।

वर्ग का I II III IV वर्ण + श् ~ छ् + अट्

उदाहरण

तद् + शिव: | तत् + शिव: | तच् + शिव: - तच्छिव:

वाक् + शूर: - वाक्छूर:

विश्वसृट् + शेते - विश्वसृट्छेते

जगत् + शान्ति: | जगच् + शान्ति: - जगच्छान्ति:

मत् + श्वशुर: | मच् श्वसुर: - मच्छ्वसुर:

यावत् + शक्यम् | यावच् + शक्यम् - यावच्छक्यम्

गुप् + शूरता - गुप्छूरता।


  1. मूर्धन्य व्यंजन / ष्टुत्व व्यंजन संन्धि (ष्टुना ष्टु:) = स् / तवर्ग के बाद या पहले ष् / टवर्ग आए तो स् को ष् तथा तवर्ग को टवर्ग हो जाता है।

स् / त् / थ् / द् / ध् / न्  +  ष् / ट् / ठ् / ड् / ढ् / ण् = ?

अथवा

ष् / ट् / ठ् / ड् / ढ् / ण्  +  स् / त् / थ् / द् / ध् / न् = ?

? = स् ~ ष् ।। त् ~ ट् ।। थ् ~ ठ् ।। द् ~ ड् ।। ध् ~ ढ् ।। न् ~ ण्

उदाहरण

तत् + टीका - तट्टीका

मत् + टीका - मट्टीका

रामस् + षष्ठ: - रामष्षष्ठ:

रामस् + टीकते - रामष्टीकते

कथ् + ठक्कुर: - कठ्ठक्कुर:

एतद् + ढक्का - एतड्ढक्का

बध् + ढौकसे - बढ्ढौकसे

पेष् + ता - पेष्टा

राष्‌ + त्रम् - राष्ट्रम्

उद् + डयनम् - उड्डयनम्

इष् + त: - इष्ट:

चक्रिन् + ढौकसे - चक्रिण्ढौकसे

महान् + डामर: - महाण्डामर:

षण् + नवति: - षण्णवति:


  1. अनुस्वार व्यंजन सन्धि (मोऽनुस्वार:) = पदान्त म्  के बाद यदि कोई व्यंजन वर्ण आए तो पदान्त म् को अनुस्वार आदेश हो जाता है।

उदाहरण

हरिम् + वन्दे - हरिं वन्दे

ग्रामम् + गच्छति - ग्रामं गच्छति

दु:खम् + प्राप्नोति - दु:खं प्राप्नोति

अहम् + धावामि - अहं धावामि

सत्यम् + वद - सत्यं वद

धर्मम् + चर - धर्मं चर

कार्यम् + कुरु - कार्यं कुरु

रामम् + पश्यति - रामं पश्यति

कुशलम् + ते - कुशलं ते

कष्टम् + सहमाना: - कष्टं सहमाना:

पुस्तकम् + पठति - पुस्तकं पठति

गुरुम् + नमति - गुरुं नमति

महत्वपूर्णम् + वर्तते - महत्वपूर्णं वर्तते


  1. अनुनासिक व्यंजन सन्धि (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा) = ह को छोडकर शेष सभी व्यंजन वर्णो के बाद यदि अनुनासिक वर्ण अर्थात् वर्ग का पंचम वर्ण आए तो शेष सभी व्यंजन वर्णो को अनुनासिक वर्ण आदेश हो जाता है।

उदाहरण

एतत् + मुरारि: - एतन्मुरारि:

षड् + मासा: - षण्मासा:

धिग् + मूर्खम् - धिङ्मूर्खम्

षट् + नवति: | षण् + नवति: - षण्णवति:

सत् + मार्ग: | सद् + मार्ग: - सन्मार्ग:

ककूब् + नायक: - ककूम्नायक:

मद् + नीति: - मन्नीति: 

त्वग् + मनसी - त्वङ्मनसी

तद् + मात्रम् - तन्मात्रम्

चित् + मयम् - चिन्मयम्

वाक् + मयम् | वाग् + मयम् - वाङ्मयम्

षड् + नाम् | षड् + णाम् - षण्णाम्

मृड् + मयम् - मृण्मयम्

अप् + मयम् - अम्मयम्

सत् + निधि: - सन्निधि:

जगत् + माता - जगन्माता


  1. परसवर्ण व्यंजन सन्धि (अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण:) = अनुस्वार को यय् (अन्त:स्थ एवं स्पर्श वर्ण) के परे रहने पर अपने वर्ग का पंचम वर्ण हो जाता है।

उदाहरण

शां + त: - शान्त:

अं + चित: - अञ्चित:

गुं + जति - गुञ्जति

कुं + ठित: - कुण्ठित:

गुं + फित: - गुम्फित:

त्वं + करोषि - त्वङ्करोषि

मधुरं + गायति - मधुरङ्गायति

आम्रं + चूषति - आम्रञ्चूषति

नदीं + तरति - नदीन्तरति

शङ्खं + धमति - शङ्खन्धमति

शिवं + भजति - शिवम्भजति


  1. परसवर्ण व्यंजन सन्धि (तोर्लि) तवर्ग के बाद यदि ल् आए तो तवर्ग के स्थान पर ल् हो जाता है साथ ही न् आने पर न् के स्थान पर अनुनासिक ल्ँ हो जाता है।

उदाहरण

तद् + लय: - तल्लय:

तद् + लीन: - तल्लीन:

चिद् + लीन: - तल्लीन:

विद्वान् + लिखति - विद्वाल्ँ लिखति

कुशान् + लाति - कुशाल्ँ लाति

Friday, May 22, 2020

मङ्गल - माहेश्वरसूत्राणि


मङ्गलाचरणम्

नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्।
पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम्।।

माहेश्वरसूत्राणि

इनकी संख्या  14  है :-
  1. अइउण्
  2.  ऋलृक्
  3. एओङ्
  4. ऐऔच्
  5. हयवरट्  
  6. लण् 
  7. ञमङणनम्
  8. झभञ्
  9. घढधष्
  10. जबगडदश्
  11. खफछठथचटतव्
  12. कपय्
  13. शषसर् 
  14.  हल्

माहेश्वरसूत्रों के आधार पर वर्णों का विभाजन

स्वर 
  1. अइउण् - अ इ उ ।।
  2.  ऋलृक् - ऋ ऌ ।। 
  3. एओङ् - ए ओ ।।
  4. ऐऔच् - ऐ औ ।।
अन्त:स्थ वर्ण
  1. हयवरट् - ह य व र ।। 
  2. लण् - ल ।।
वर्ग का पाँचवां अक्षर
  1. ञमङणनम् - ञ म ङ ण न ।।
वर्ग का चौथा अक्षर
  1. झभञ् -  झ भ ।। 
  2. घढधष् - घ ढ ध ।।
वर्ग का तीसरा अक्षर
  1. जबगडदश् - ज ब ग ड द ।।
वर्ग का दूसरा और पहला अक्षर
  1. खफछठथचटतव् - ख फ छ ठ थ च ट त ।।
  2. कपय् - क प ।।
ऊष्म वर्ण
  1. शषसर् - श ष स ।।
  2.  हल् - ह ।।

प्रत्याहार-निर्माण

इनकी संख्या  44  है :-
  1. अण् - अ इ उ
  2. अक् - अ इ उ ऋ ऌ
  3. अच् - सभी स्वर
  4. अट् - सभी स्वर और ह य व र 
  5. अण् - सभी स्वर, ह और अन्त:स्थ
  6. अम् - सभी स्वर, ह अन्त:स्थ और वर्ग का पांचवा अक्षर
  7. अश् - सभी स्वर, ह अन्त:स्थ और वर्ग का तीसरा चौथा पांचवा अक्षर
  8. अल् -  सभी स्वर व व्यंजन वर्ण 
  9. इक् - इ उ ऋ ऌ 
  10. इच् - इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ
  11. इण् - इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ ह और अन्त:स्थ
  12. उक् - उ ऋ ऌ
  13. एङ् - ए ओ
  14. एच् - ए ओ ऐ औ
  15. ऐच् - ऐ औ
  16. हश् - ह अन्त:स्थ और वर्ग का तीसरा चौथा पांचवा अक्षर
  17. हल् - सभी व्यंजन वर्ण
  18. यण् - अन्त:स्थ वर्ण
  19. यम् - अन्त:स्थ और वर्ग का पांचवा अक्षर
  20. यञ् - अन्त:स्थ, वर्ग का पांचवा अक्षर‌ और झ भ
  21. यय् - अन्त:स्थ और वर्ग का पहला दूसरा तीसरा चौथा पांचवा अक्षर
  22. यर् - अन्त:स्थ, सभी वर्ग और श ष स
  23. वश् - व र ल और वर्ग का तीसरा चौथा पांचवा अक्षर
  24. वल् - शेष सभी व्यंजन वर्ण य को छोड़कर
  25. र / रँ - र ल
  26. रल् - शेष सभी व्यंजन वर्ण य व को छोड़कर
  27. ञम् - वर्ग का पांचवा अक्षर
  28. मय् - म ङ ण न और वर्ग का पहला दूसरा तीसरा चौथा अक्षर
  29. ङम् - ङ ण न 
  30. झष् - वर्ग का चौथा अक्षर
  31. झश् - वर्ग का तीसरा चौथा अक्षर
  32. झय् - वर्ग का पहला दूसरा तीसरा चौथा अक्षर
  33. झर् - वर्ग का पहला दूसरा तीसरा चौथा अक्षर और श ष स
  34. झल् - वर्ग का पहला दूसरा तीसरा चौथा अक्षर और ऊष्म वर्ण
  35. भष् - भ घ ढ ध
  36. जश् - वर्ग का तीसरा अक्षर
  37. बश् - ब ग ड द
  38. खय् - वर्ग का पहला दूसरा अक्षर
  39. खर् - वर्ग का पहला दूसरा अक्षर और श ष स
  40. छव् - छ ठ थ च ट त
  41. चय् - वर्ग का पहला अक्षर
  42. चर् - वर्ग का पहला अक्षर और श ष स
  43. शर् - श ष स
  44. शल् - उष्म वर्ण


Monday, May 18, 2020

स्वर सन्धि ~ 2

स्वर सन्धि ~ 2


यण् स्वर सन्धि (इकोयणचि) = इ उ ऋ ऌ के बाद यदि इनसे भिन्न‌ कोई स्वर आए तो क्रमश:को य् को व् ऋ को र् और को ल् हो जाता है।
इ/ई + कोई इ/ई से भिन्न स्वर = (इ/ई ~ य्)
उ/ऊ + कोई उ/ऊ से भिन्न स्वर = (उ/ऊ ~ व्)
ऋ + कोई ऋ से भिन्न स्वर = (ऋ ~ र्)
ऌ + कोई ऌ से भिन्न स्वर = (ऌ ~ ल्)


उदाहरण
इ/ई + कोई इ/ई से भिन्न स्वर = (इ/ई ~ य्)
सुधी + उपास्य: - सुध्युपास्य:
अति + उत्तम: - अत्युत्तम:
इति + अत्र - इत्यत्र
इति + आदि - इत्यादि
यदि + अपि - यद्यपि
प्रति + एकम् - प्रत्येकम्
दधि + आनय - दध्यानय
नदी + उद्कम् - नद्युद्कम्
स्त्री + उत्सव: - स्त्र्युत्सव:
नारी + अत्र - नार्यत्र
स्मृति + आदेश: - स्मृत्यादेश:
वारि + अस्ति - वार्यस्ति
शशी + उदियाय - शश्युदियाय
अभि + उदय: - अभ्युदय:


उ/ऊ + कोई उ/ऊ से भिन्न स्वर = (उ/ऊ ~ व्)
मधु + अरि: - मध्वरि:
अनु + अय: - अन्वय:
सु + आगतम् - स्वागतम्
गुरु + आदेश: - गुर्वादेश:
साधु + इति - साध्विति
मनु + आदि: - मन्वादि:
वधू + आगम: - वध्वागम:
वस्तु + अस्ति - वस्त्वस्ति


ऋ + कोई ऋ से भिन्न स्वर = (ऋ ~ र्)
धातृ + अंश: - धात्रंश:
पितृ + अनुमति: - पित्रनुमति:
मातृ + आज्ञा - मात्राज्ञा
भ्रातृ + उक्तम् - भ्रात्रुक्तम् 
सवितृ + उदय: - सवित्रुदय:


ऌ + कोई ऌ से भिन्न स्वर = (ऌ ~ ल्)
ऌ + आकृतिः - लाकृतिः
ऌ + अनुबन्ध: - लनुबन्ध:
ऌ + आकार: - लाकार:


अयादि स्वर सन्धि (एचोऽयवायाव:) = ए ओ ऐ औ के बाद यदि कोई भी स्वर आए तो क्रमश: को अय् ओ को अव् ऐ को आय् और को आव् हो जाता है।
ए + कोई स्वर = (ए ~ अय्)
ओ + कोई स्वर = (ओ ~ अव्)
ऐ + कोई स्वर = (ऐ ~ आय्)
औ + कोई स्वर = (औ ~ आव्)


उदाहरण
ए + कोई स्वर = (ए ~ अय्)
हरे + ए - हरये
शे + अनम् - शयनम्
ने + अनम् - नयनम्
चे + अनम् - चयनम्
शे + आन: - शयान:


ओ + कोई स्वर = (ओ ~ अव्)
विष्णो + ए - विष्णवे
विष्णो + इति - विष्णविति
विष्णो + इह - विष्णविह
पो + अन: - पवन:
पो + इत्रम् - पवित्रम्
भो + अति - भवति
भो + अनम् - भवनम्


ऐ + कोई स्वर = (ऐ ~ आय्)
नै + अक: - नायक:
गै + अक: - गायक:
गै + अनम् - गायनम्


औ + कोई स्वर = (औ ~ आव्)
पौ + अक: - पावक:
भौ + उक: - भावुक:
नौ + इक: - नाविक:
धौ + अक: - धावक:
असौ + अयम् - असावयम्
भौ + अयति - भावयति
इन्दौ + उदिते - इन्दावुदिते


विशेष नियम -
ओ + यकारादि प्रत्यय = (ओ ~ अव्)
गो + यम् - गव्यम्
गो + यूति: - गव्यूति:
औ + यकारादि प्रत्यय = (औ ~ आव्)
नौ + यम् - नाव्यम्



पूर्वरूप स्वर सन्धि (एङः पदान्तादति) = पदान्त ए ओ के बाद यदि आए तो दोनो वर्णों के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश ए ओ ही हो जाता है। साथ ही को अवग्रह (ऽ) हो जाता है।
ए + अ = एऽ
ओ +अ = ओ


उदाहरण
ए + अ = एऽ
अन्ते + अपि - अन्तेऽपि
हरे + अव - हरेऽव
मे + अन्तिके - मेऽन्तिके
गुरवे + अदात् - गुरवेऽदात्


ओ +अ = ओऽ
विष्णो + अव - विष्णोऽव
को + अपि - कोऽपि
सो + अवदत् - सोऽवदत्
नमो + अस्तु - नमोऽस्तु
गो + अग्रम् - गोऽग्रम् 


पररूप स्वर सन्धि (एङि पररूपम्) = वर्णान्त उपसर्ग के बाद यदि ए ओ आए तो दोनो वर्णों के स्थान पर पररूप एकादेश ए ओ ही हो जाता है।
अ + ए = ए
अ + ओ = ओ


उदाहरण
अ + ए = ए
प्र + एजते - प्रेजते
उप + एजते - उपेजते
अव + एजते - अवेजते
प्र + एषयति - प्रेषयति


अ + ओ = ओ
उप + ओषति - उपोषति
प्र + ओषति - प्रोषति
अव + ओषति - अवोषति


विशेष नियम -
टि भाग को पररूप एकादेश
शक + अन्धु: - शकन्धु: (शक - अ)
कर्क + अन्धु: - कर्कन्धु: (कर्क - अ)
कुल + अटा - कुलटा (कुल - अ)
सीम + अन्त: - सीमन्त: (सीम - अ)
सार + अङ्ग: - सारङ्गः (सार - अ)
मनस् + ईषा - मनीषा (मनस् - अस्)
पतत् + अञ्जलिः - पतञ्जलिः (पतत् - अत्)


Note ~ यहाँ शक, कर्क, कुल, सीम और सार मेंतथा मनस् मे अस् पतत् मे अत्  टि भाग है।